Tuesday, April 28, 2020

Individual and Social Responsibility


हमें फर्द और कौम में फ़र्क़ करना बहुत ज़रूरी है। क़ुरान और हदीस की रौशनी में आपको यह फ़र्क़ बताता हु।
आख़िरत में हिसाब फर्द से होंगे , हर किसी को अपना हिसाब देना है, अल्लाह के आगे हर कोई अकेला आएंगे , कोई किसी का हिसाब नहीं देंगे।
क़स्सास /बदला शरीअत में हमेशा फर्द से किया है कौम से नहीं। जो आयात करीमा मैंने लिखी है आखिर में यह है , अगर तुम उसे माफ़ कर दो तो वह तुम्हारा इंसानी भाई है।
और हम ने तौरेत में यहूदियों पर यह हुक्म फर्ज़ कर दिया था कि जान के बदले जान और आँख के बदले आँख और नाक के बदले नाक और कान के बदले कान और दाँत के बदले दाँत और जख़्म के बदले (वैसा ही) बराबर का बदला (जख़्म) है फिर जो (मज़लूम ज़ालिम की) ख़ता माफ़ कर दे तो ये उसके गुनाहों का कफ़्फ़ारा हो जाएगा और जो शख़्स ख़ुदा की नाजि़ल की हुयी (किताब) के मुवाफि़क़ हुक्म न दे तो ऐसे ही लोग ज़ालिम हैं (क़ुरान ५;४५ )
इस्लाम में अच्छाई आम कही है , और बुराई, खराबी, हराम का दायरा तय कर दिया गया है।
अगर किसी फर्द ने गुनाह किया है तो उसका बदला उसी तक है, उस कौम को सजा देना यह इस्लाम का तरीका नहीं है, नहीं तारीख से हमें इसकी मिसाल मिलिटी है। बस्तिया जलाना , औरतो की अज़मत लूटना, यह हमारा किरदार कभी नहीं रहा, हमारे मौक़ूफ़ पर जम जाना मगर ज़ुल्म नहीं करना यह इस्लाम का शाएर है।
ऐ ईमानदारों ख़ुदा (की ख़ुशनूदी) के लिए इन्साफ़ के साथ गवाही देने के लिए तैयार रहो और तुम्हें किसी क़बीले की अदावत इस जुर्म में न फॅसवा दे कि तुम नाइन्साफी करने लगो (ख़बरदार बल्कि) तुम (हर हाल में) इन्साफ़ करो यही परहेज़गारी से बहुत क़रीब है और ख़ुदा से डरो क्योंकि जो कुछ तुम करते हो (अच्छा या बुरा) ख़ुदा उसे ज़रूर जानता है (क़ुरान ५;८ )
इस्लाम का सबसे अहम् पहलू यह है, इस्लाम ने इंसाफ, मोहब्बत, मसावात, को मुकद्दम रखा, अफ़ज़ल रखा।  इस्लाम में जुल्म, नाइंसाफी, नफरत , तबक़ाति निज़ाम के लिए कोई जगह नहीं।  हमारे मौक़फ़ पर जम जाना, उसपे डटे रहना और हमारे मौक़फ़ के लिए सब कुछ क़ुर्बान करना इस्लाम कहलाता है।
मगर हमारे मौक़फ़ पर डट जाने का मतलब यह नहीं है हम मयार से गिर जाए।
बदजुबानी का जवाब बदजुबानी नहीं है , जुल्म का जवाब इंसाफ है। नफरत का जवाब मोहब्बत है।  यह हमारे प्यारे रसूल सल्ललाहो अलैहि वस्सलाम की सुन्नत है।
अल्लाह  रसूल सल्ललाहो अलैहि वस्सलाम का ताइफ़ का सफर और उसके बाद जो जुल्म किया गया , जिसके ताल्लुक से खुद प्यारे रसूल फरमाते है वह ज़िन्दगी का सबसे ज्यादा आजमाइश का दिन था।  अम्मा आइशा रजि अल्लाह अन्हा फरमाती है मैंने प्यारे रसूल सल्ललाहो अलैहि वस्सलाम से पूछा क्या जंग ओहद से मुश्किल भी कोई दिन आपने देखा , प्यारे रसूल फरमाते है है, ताइफ़ का सफर वह दिन था। ( अबू दावूद , तिरमिधि ) दोनों जगह यह हदीथ मौजूद है।  यह वह सफर था जब दोनों दुनियावी सहारे उम्मुल मोमिनीन खदीजा रजी अल्लाह और अबू तालिब वफ़ात प् चुके थे, मक्काः की सरजमीन दिन के दावत के लिए तंग हो चुकी थी, उस हालात में यह सफर हुआ था।
जिस्म लहू लहान था , वक़्त का रसूल गमगीन था, हाथ उठा कर दुआ करते ,
ये अल्लाह! अकेले आप को  मैं अपनी लाचारी, अपने संसाधनों की कमी और मानव जाति के समक्ष अपनी तुच्छता की शिकायत करता हूं। आप सबसे दयालु हैं। आप असहाय और कमजोरों के स्वामी हैं, हे मेरे अल्लाह  किसके हाथों में तुम मुझे छोड़ोगे: दूर के रिश्तेदार के हाथों में जो मुझ बिलकुल भी सहानुभूति नहीं रखते ,  या मेरे मामलों पर नियंत्रण रखने वाले दुश्मन को? लेकिन  ऐ अल्लाह तू  मुझसे नाराज़  गुस्सा नहीं तो मेरे लिए कोई गम की फ़िक्र की बात नहीं।
दुआ के बाद गैब्रिएल अलैहिसलाम आकर अल्लाह के रसूल को सलाम करते और कहते अल्लाह ने आपकी दुआ सुन ली , आपके लिए पहाड़ के फ़रिश्ते भेजे है , आज आप जो हुक्म दो यह पूरा करेंगे।और पहाड़ के फ़रिश्ते सलाम करते , और कहते आप हुक्म करे तो हम आज पूरी बस्ती को दोनों पहाड़ो के बिच दबा दे।
अल्लाह के रसूल जो इंसानियत के लिए सरापा रहमत थे ,  लहुलूहान जिस्म , कमजोर और गमगीन , फिर भी उस रसूल की रहमत पुकार उठी , नहीं ऐसा न करे , मुझे पूरी उम्मीद है इनकी आने वाले नस्ल ज़रूर ईमान लाएंगी। यह वह वक़्त है जब इस्लाम कमजोर था।
फिर जंग बद्र हुई , और फतह मक्काः, ३ लोग जो बारए रास्त मुजरिम थे माफ़ी का एलान हुआ।  मेरे रसूल की रहमत आज फिर पुकार उठी , आज मैंने सबको माफ़ किया।
मक्का के सरदार अबू सुफियान शिकस्ता खड़े है , अल्लाह के रसूल पूछते है , बताओ तुम मुझसे क्या चाहते हो, मुझसे क्या उम्मीद रखते हो,  अबू सुफियान जवाब देते , तुम आला ज़र्फ़ भाई हो , एक आला ज़र्फ़ भाई के बेटे हो , हम आपके भलाई उम्मीद रखते है। 
रहमतिल्लील आलमीन ऐलान करते , जो अबू सुफियान के घर में दाखिल हुआ उसे माफ़ किया , जो खाने काबा में दाखिल हुआ उसे माफ़ किया , जिसने अपने दरवाजे बंद किये  उसे माफ़ किया, और आम माफ़ी का ऐलान हुआ।
एक अजीब मंज़र था एक फ़ातेहाना फ़ौज , सर को झुकाये हुये शहर में दाखिल होती है।
खाने काबा पे अज़ान देने का वक़्त हुआ तो एक गुलाम , काला , हब्शी बिलाल ( रजि अल्लाह ) को मेरे और आपके प्यारे रसूल सल्ललाहो अलैहि वस्सलाम हुक्म देते, और मेरे आका के कंधे पर पैर रख कर वो ऊपर चढ़ाते है और अजान दी जाती। यह वही मक्काः है , जहा आका अबू जहल बिलाल (रजि अल्लाह ) तपती हुए रेत पर लिटा कर वजनदार पत्थर रखता था , और जबान से अहद अहद निकालता था। आज वह फातेह था , यह इन्किलाब है।
यह मेयार इ मसावात है , यह मेयार बराबरी है।

और यह तारीख अस्लाफ ने जारी रखी,  जेरुसलम मस्जिद अक़्सा फ़तेह हुई , और वक़्त के खलीफा , अमीरुल मोमिनीन को पैगाम लिखा जाता और जाबी (कुंजी / keys ) लेने के लिए बुलाया जाता है। 
एक वक़्त का सबसे बड़ी सल्तनत का बादशाह और उसका गुलाम एक ऊंट पर सफर करते है , और बारी बारी सवारी करते है , जिस वक़्त शहर नजदीक होता है तो बारी गुलाम की होती है , आका ऊंट की रस्सी पकड़े हुआ होता है।  गुलाम कहता आप ऊंट पर सवार हो जाये अमीरुल मोमिनीन , मगर वह इस से इंकार कर देते और यह दो लोगो काफिला शहर पहुँचता है , एक अजीबो गरीब मंजर है , जो तारीख ने पहले कभी नहीं देखा है।
आधी दिनिया का बादशाह , अमीरुल मोमिनीन , खलीफा इ वक़्त , शहर में अमन का ऐलान करते हुआ शहर में दाखिल होते है , मुसलमानो की फ़ौज अपने कमांडर अमीन अल उम्मत अबू ओबैदा बिन ज़र्राह की क़यादत में शहर पे अमन का परचम लहराती है।
मस्जिद इ अक़्सा में २ रकत नमाज पढ़ी गयी।
मस्जिद इ अक़्सा और शहर सलाहुद्दीन अयूबी रहमतुल्लाह अलैहि ने वापस फतह किया और हर शहरी को अमन दिया।
मेहमत फ़तेह ने इस्ताम्बुल / कन्सिसटिनोपाल फ़तेह किया, हर शहरी को दिन की आज़ादी दी एंड अमन का ऐलान किया।
हमारी तारीख एक इंसाफ, बराबरी और मसावात की तारीख है।

दूसरा पॉइंट जो मै कहना चाह रहा हु वह वो अच्छी आम है , बुराई और हराम है।
जिन पे हद नाफ़िज़ होती है वह जुर्म मुतय्यन है, जीना , क़त्ल , मुर्तद , गुस्ताख़ इ रसूल, तो हमारे यहाँ बुराई व्याख्या कर दी गए है।
ऐ ईमानदारों जो कुछ हम ने तुम्हें दिया है उस में से सुथरी चीज़ें (षौक़ से) खाओं और अगर ख़ुदा ही की इबादत करते हो तो उसी का शुक्र करो (२: 172)
उसने तो तुम पर बस मुर्दा जानवर और खू़न और सूअर का गोश्त और वह जिस पर ज़िबह के वक़्त ख़ुदा के सिवा और किसी का नाम लिया गया हो हराम किया है बस जो शख्स मजबूर हो और सरकशी करने वाला और ज़्यादती करने वाला न हो (और उनमे से कोई चीज़ खा ले) तो उसपर गुनाह नहीं है बेशक ख़ुदा बड़ा बख़्शने वाला मेहरबान है (२:173)
(लोगों) मरा हुआ जानवर और ख़ून और सुअर का गोश्त और जिस (जानवर) पर (जि़बाह) के वक़्त ख़ुदा के सिवा किसी दूसरे का नाम लिया जाए और गर्दन मरोड़ा हुआ और चोट खाकर मरा हुआ और जो कुएं (वगै़रह) में गिरकर मर जाए और जो सींग से मार डाला गया हो और जिसको दरिन्दे ने फाड़ खाया हो मगर जिसे तुमने मरने के क़ब्ल जि़बाह कर लो और (जो जानवर) बुतों (के थान) पर चढ़ा कर ज़िबाह किया जाए और जिसे तुम (पाँसे) के तीरों से बाहम हिस्सा बाटो(ग़रज़ यह सब चीज़ें) तुम पर हराम की गयी हैं ये गुनाह की बात है (मुसलमानों) अब तो कुफ़्फ़ार तुम्हारे दीन से (फिर जाने से) मायूस हो गए तो तुम उनसे तो डरो ही नहीं बल्कि सिर्फ मुझी से डरो आज मैंने तुम्हारे दीन को कामिल कर दिया और तुमपर अपनी नेअमत पूरी कर दी और तुम्हारे (इस) दीने इस्लाम को पसन्द किया बस जो शख़्स भूख़ में मजबूर हो जाए और गुनाह की तरफ़ माएल भी न हो (और कोई चीज़ खा ले) तो ख़ुदा बेशक बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है (५:3)

अल्लाह ने हलाल और हराम को तय कर दिया है , अच्छी आम है और बुराई मुआइन है।
ऐ ईमानदारों शराब, जुआ और बुत और पाँसे तो बस नापाक (बुरे) शैतानी काम हैं तो तुम लोग इससे बचे रहो ताकि तुम फलाह पाओ (५:90)
शैतान की तो बस यही तमन्ना है कि शराब और जुए की बदौलत तुममें बाहम अदावत व दुश्मनी डलवा दे और ख़ुदा की याद और नमाज़ से बाज़ रखे तो क्या तुम उससे बाज़ आने वाले हो (५:91)

यह काम जो हराम है और इन्हे रोकना हमारी जिम्मेदारी है। 
और तुमसे एक गिरोह ऐसे (लोगों का भी) तो होना चाहिये जो (लोगों को) नेकी की तरफ़ बुलाए अच्छे काम का हुक्म दे और बुरे कामों से रोके और ऐसे ही लोग (आख़ेरत में) अपनी दिली मुरादें पायेंगे (३:104)
तुम क्या अच्छे गिरोह हो कि (लोगों की) हिदायत के वास्ते पैदा किये गए हो तुम (लोगों को) अच्छे काम का हुक्म करते हो और बुरे कामों से रोकते हो और ख़ुदा पर ईमान रखते हो और अगर एहले किताब भी (इसी तरह) ईमान लाते तो उनके हक़ में बहुत अच्छा होता उनमें से कुछ ही तो इमानदार हैं और अक्सर बदकार (३:110)

यह मुस्लिम उम्मत का बुनियादी काम है।  अच्छाई / भलाई का हुक्म देना और बुराई से रोकना।  जो चीज़े रोकने की है , मैंने ऊपर बताई है।  इस वक़्त सबसे अहम् काम है अच्छाई को आम करना।

क़ुरान में अल्लाह अज्जो व जल्लो फरमाता है ,
इसमें तो शक ही नहीं कि ख़ुदा ने मोमिनीन से उनकी जानें और उनके माल इस बात पर ख़रीद लिए हैं कि (उनकी क़ीमत) उनके लिए बेहष्त है  जन्नत  ९:१११
भाइयो हम सख्त हालात से गुजर  रहे है , इस दौर में अपने हिसाब से अपने भाई की मदद करे , कोई भी भूखा नहीं सोये , कोई बच्चा खाने की लिए नहीं रोये इसका पूरा ख्याल रखे। 
ज्यादा से ज्यादा सदक़ह करे, अल्लाह का वादा है  , वह दुनिया और आख़िरत बेहतर अजर ने नवाजेगा, अल्लाह के खजाने में कोई कमी नहीं है  , आप दिल खोल के खर्च करे।
क़ुरान और अपने एहद का पूरा करने वाला ख़़ुदा से बढ़कर कौन है तुम तो अपनी ख़रीद फरोख़्त से जो तुमने ख़़ुदा से की है खुषियाँ मनाओ यही तो बड़ी कामयाबी है (९:111)

इब्न अबी शायबा ने बताया: अल्लाह के रसूल, सल्ललाहो अलैहि वस्सलाम  ने कहा:
हर नेक काम परोपकार ( सदक़ह ) होता है।
एक अन्य कथन में, पैगंबर ने कहा:
हर नेक काम परोपकार ( सदक़ह ) होता है। वास्तव में, मुस्कुराते हुए चेहरे के साथ अपने भाई से मिलना।
दान, इस व्यापक अर्थ में, केवल पैसा नहीं दे रहा है बल्कि यह जीवन का एक तरीका है। मुसलमानों की नैतिक जिम्मेदारी है कि वे अपने धन, समय, और अल्लाह के आशीर्वाद के लिए कृतज्ञता के कृत्यों के रूप में हर दिन दान करें। अल्लाह ने हमें स्वास्थ्य, धन, समय और ऊर्जा दी है इसलिए हमें उसकी सेवा में दूसरों को वापस देने की आवश्यकता है।

अबू हुरैरा ने बताया: अल्लाह का रसूल, शांति और आशीर्वाद उस पर हो, कहा:
दान हर दिन के लिए लोगों के हर संयुक्त पर होता है, जिस दिन सूरज उगता है। सिर्फ दो लोगों के बीच होना ही दान है। अपने जानवर के साथ एक आदमी की मदद करना और उस पर अपना सामान उठाना दान है। एक प्रकार का शब्द दान है। मस्जिद की ओर जाने वाला हर कदम परोपकार है, और सड़क से हानिकारक चीजों को हटाना दान है।
अबू हुरैरा ने बताया: अल्लाह का रसूल, सल्ललाहो अलैहि वस्सलाम फरमाते है ,
सबसे अच्छा दान वह है जो आप खुमुखतर होने पर देते हैं, और आपको अपने आश्रितों ( घरवालों )पर खर्च करने से शुरू करना चाहिए।
जब कोई मुस्लिम अपने परिवार पर अच्छा खर्च करता है तो उसे उसके लिए दान माना जाता है।

सदक़ह दान लेने वाल देने वाले पे अहसान करता है।  क्योंकि सदक़ह से फायदा सिर्फ देने वालेको होता है।
जो लोग इस वक़्त मदत कर रहे है , वह यह बात अच्छे से अपने जहाँ में बिठा ले , लेने वाला आप पे अहसान कर रहा , इस सदक़ह का फायदा आपको दुनिया और आख़िरत में होंगे।  इस तरह सोच रखने से तकब्बुर नहीं आता / गरूर नहीं आता। 
अल्लाह आपके हर सदक़ह को कबूल करे।

यह आपको आपदा से बचाता है
पैगंबर, उस पर शांति हो, ने कहा: "देरी के बिना दान दें, क्योंकि यह आपदा के रास्ते में खड़ा है।" (तिर्मिज़ी)

यह एक अच्छा काम है जो कभी खत्म नहीं होता है
मुहम्मद सल्ललाहो अलैहि वस्सलाम ने  कहा: "जब एक आदमी मर जाता है, तो तीन कामों को छोड़कर उसके कर्म समाप्त हो जाते हैं: सदाक़ाह जरीयाह (निर्जीव दान); एक ज्ञान जो लाभदायक है, या एक पुण्य वंशज है जो उसके लिए (मृतक के लिए) प्रार्थना करता है। ” (मुस्लिम)

आख़िरत न्याय के दिन दान एक शेड होगा
पैगंबर, सल्ललाहो अलैहि वस्सलाम  " फिर ज़िंदा कर के उठाये जाएंगे  के दिन पर ईमान वालो  की छाया उसकी दानशीलता होगी।" (तिर्मिज़ी)

6) यह आपको नरक से बचाता है
पैगंबर मुहम्मद ने शांति के साथ कहा, "दान के रूप में खजूर  का एक टुकड़ा देकर भी खुद को नरक-आग से बचाएं।" (अल-बुखारी और मुस्लिम)

7) यह बढ़ाता है कि अल्लाह सुभानवताल जो दिया है। 
"अल्लाह, अज्ज व जल्ल कहते हैं, आदम के हे बेटे, खर्च करो, और मैं तुम पर खर्च करूँगा ।" - पैगंबर मुहम्मद, सल्ललाहो अलैहि वस्सलाम
मुसलमानो का किरदार मुसलमानो की सबसे बड़ी अमानत है।
हमेशा बातिल ने इसी चीज़ पर हमला किया है।  यस वह चीज़ है, जो मुस्लमान और बातिल में फर्क कराती है।  हमारी ज़िन्दगी का हर शोबा , हर अमल हर कदम एक नेकी है। जब हम ऐसे अल्लाह के लिए करेंगे तो इसका अजर अल्लाह अज्ज व जल्ल देंगे।
और बेशक ( अल्लाह  रसूल ) एख़लाक़ बड़े आला दर्जे के हैं (६८:4)
(मुसलमानों) तुम्हारे वास्ते तो खु़द रसूल अल्लाह का एक अच्छा नमूना था (मगर हाँ यह) उस शख़्स के वास्ते है जो खु़दा और रोजे़ आखे़रत की उम्मीद रखता हो और खु़दा की याद बाकसरत करता हो (३३:21)
अल्लाह अल्लाह की गवाही है, अल्लाह के रसूल और हमारे प्यारे नबी सल्ललाहो अलैहि वस्सलाम हमेशा के लिए सबसे बेहतरीन किरदार और नमूना है और हमें उनको फॉलो करना कामयाबी के लिए।
बातिल हमेशा से जानता है, हमारा इन्किलाब हमारे ज़िन्दगी से शुरू होता है।  हमारे अख़लाक़ हमारे किरदार हमारा सब से बड़ा असासा है।  हमेशा से सबसे पहले अटैक किया गया। 
क़ुरान हमें बताता है छूट से कैसा  जाये। 
ऐ ईमानदारों अगर कोई बदकिरदार तुम्हारे पास कोई ख़बर लेकर आए तो ख़ूब तहक़ीक़ कर लिया करो (ऐसा न हो) कि तुम किसी क़ौम को नादानी से नुक़सान पहुँचाओ फिर अपने किए पर नादिम हो (४९ :६)
आज सोशल मीडिया के जमाने में इसकी जरूरत ज्यादा हो गयी है।  हर न्यूज़ को चेक करो, फिर उसे आगे बढ़ाये।
बल्कि ये तुम्हारे हक़ में बेहतर है इनमें से जिस शख़्स ने जितना गुनाह समेटा वह उस (की सज़ा) को खुद भुगतेगा और उनमें से जिस शख़्स ने तोहमत का बड़ा हिस्सा लिया उसके लिए बड़ी (सख़्त) सज़ा होगी (२४ :11)
और जब तुम लोगो ने उसको सुना था तो उसी वक़्त इमानदार मर्दों और इमानदार औरतों ने अपने लोगों पर भलाई का गुमान क्यो न किया और ये क्यों न बोल उठे कि ये तो खुला हुआ बोहतान है (२४:12)

यह हमारे हमेशा मयार होना चाहिए। 
इंक़लाब की पहली मंज़िल है ज़िन्दगी में इन्किलाब।
हमारी  इन्किलाब आना ज़रूरी है।  अगर ज़िन्दगी में इन्किलाब आएंगे तो जामी पे इन्किलाब आएंगे।
इमां वाले / मुसलमान कैसे होते है , अल्लाह ने  अपनी किताब कुरान मजीद में कुछ इस तरह , बयां किया है , पड़ते पड़ते यह आयात मेरे आँखों से गुजारी सोचा आपके साथ शेयर करू , (ये लोग) तौबा करने वाले इबादत गुज़ार (ख़़ुदा की) हम्दो सना (तारीफ़) करने वाले (उस की राह में) सफर करने वाले रूकूउ करने वाले सजदा करने वाले नेक काम का हुक्म करने वाले और बुरे काम से रोकने वाले और ख़ुदा की (मुक़र्रर की हुयी) हदो को निगाह रखने वाले हैं और (ऐ रसूल) उन मोमिनीन को (बेहिष्त की) ख़ुषख़बरी दे दो (112) सूरह तौबा  - यह मुस्लमान का मयार है , हमें अपना एहतेसब करना चाहिए , अपना जायजा लेना चाहिए हम कहा खड़े है।  रमदान का महीना है , अल्लाह ने हमें खाली वक़्त दिया है , अल्लाह की किताब का मुताला करे , समझे ज़िन्दगी में लाये। ऐसी में दुनिया और आख़िरत की कामयाबी है।

इब्न अब्बास रजी अल्लाह अन्हो से रिवायत है , अल्लाह के रसूल सल्ललाहो अलैहि वस्सलाम ने फ़रमाया पांच चीजों को पांच चीजों से पहले गनीमत जानो , जवानी को बुढ़ापे से पहले , सेहत को बीमारी से पहले, मालदारी को फकीरी से पहले , खली वक़्त को मशगुलियत से पहले , ज़िन्दगी को मौत से पहले।
किसी की नज़र न लगे आप को , अल्लाह से दुआ कर दू।
माशा अल्लाह सुभान अल्लाह


जो लोग अपनी ज़िन्दगी में इन्किलाब नहीं ला सकते वो जमीन कभी कामयाब इन्किलाब नहीं ला सकते।
मक्काः की १३ साल की तारीख यह जिन्दगी में इन्किलाब की तारीख है , इतिहास है।
रमदान आ रहा है , हम अपने ज़िन्दगी में इन्किलाब लाये। अल्लाह से हमारा हक़ीक़ी ताल्लुक मजबूत करे।
मक्काः के १३ साल सुमय्या (रजि अल्लाह ) की शाहदत की तारीख है।
बिलाल रजि अल्लाह के तपते हुआ रेगिस्तान से निकले हुआ अहद अहद के पुकार की दास्ताँ है।
शैब इ अभी तालिब के फाकाकशी की तारीख है।
हिजरत इ हब्शा की तारीख है। यह अहद पैमान की तारीख है। यह एक ताक़तवर जालिम के आगे एक मजबूत ईमान की तारीख है।
रमदान आ रहा है , अपनी ज़िन्दगी में इन्किलाब लाये।
हलाल और हराम का फ़र्क़ समझे और हर हराम से , हर तरह के करप्शन को अपनी जिंदगी से निकल बहार करे।
जो लोग जिंदगी में इन्किलाब आएंगे वही लोग जमीन पे इन्किलाब ला सकते है।
आज भी हो जो इब्राहिम सा ईमान पैदा
आग कर सकती है अंदाज़ इ गुलिस्तां पैदा

रमदान में ज़िन्दगी में इन्किलाब कैसे लाये।
ताल्लुक़ बिल्लाह को मज़बूत करे
फर्द (फर्ज ) सबसे पहले है, उसे पूरा करे , सलात (नमाज) वक़्त पर पढ़े, पूरी पढ़े।  दिल लगा के पढ़े , यह पहली कड़ी है।
ज़कात दे , पूरी दे , वक़्त पर दे , सही लोगो तक पहुचाये।
सबसे पहले हक़दार यतीम बच्चे , गरीब, मिस्कीन , मौतज , जो आपके रिश्तेदार हो , जो आपका पडोसी हो, इन्हे पहले ख्याल रखे। 

अगर हम हमारी ज़िन्दगी में तब्दीली लाते है।  अल्लाह बताये हुआ  रस्ते पे चलते है, अल्लाह के नबी सल्ललाहो अलैहि वस्सलाम के तरीके को अपनाते हुआ आगे बङोंगे तो बहोत अनक़रीब इन्किलाब आयेंगा।

Sunday, April 26, 2020

How to Welcome Ramadan


इस्तेकबाल इ रमदान
 तमाम तारीफ अल्लाह के वास्ते है। लाखो दरूद ओ सलाम हो पैगम्बर मोहम्मद सल्ललाहो अलैहि वस्सलाम पर , उसके परिवार, उसके साथियों और उन के बाद आने वाले मुसलमानो पर, जो आख़िरत पर इमां लाते और रसूल के रस्ते पे चलते ।
अल्लाह ने इस महीने को अन्य महीनों में कई फायदे और गुणों के साथ आशीर्वाद दिया है, और निम्नलिखित गुणों के कारण इसे प्रतिष्ठित किया है;
यह वह महीना है जिसमें  कुरआन करीम का नाज़िल  हुआ था। अल्लाह कहता है:
 "रमजान का महीना जिसमें कुरआन का नाज़िल हुआ था" (2: 185)
इस महीने के आखिरी दस दिनों की विषम रातों में से एक रात क़दर की होंगी । उस रात में अल्लाह की इबादत करना एक हजार महीने की इबादत से बेहतर है। अल्लाह कहता है;
 "अल-क़द्र (डिक्री) की रात एक हजार महीने से बेहतर है।" (97: 3)
एक हजार महीने का मतलब 83 साल और 4 महीने है, जो औसत व्यक्ति पूरा नहीं करता है। यह इस माह में एक बहुत ही जबरदस्त रात प्रदान करते हुए, इस मुस्लिम उम्मा को अल्लाह ने सबसे अच्छा इनाम  है।

रमदान के सबसे अहम् आमाल काम /कर्म
1. रोजा/ सौम
इस महीने का सबसे अच्छा आमाल रोजा / उपवास है। अल्लाह के रसूल सल्ललाहो अलैहि वस्सलाम  ने कहा: "आदम  (इंसानो ) के बच्चों के सभी आमाल उनसे हैं मगर रोज़ा मेरे ( अल्लाह) लिए है , और अच्छे कर्मों/ आमाल का बदला /सवाब  दस गुना से सात सौ गुना तक है। अल्लाह सर्वशक्तिमान और महान कहते हैं:, उपवास/रोजा  को छोड़कर, जो मेरे लिए है, और मैं इसके लिए इनाम दूंगा। उसने मेरी खातिर अपना खाना, पीना और इच्छाएँ छोड़ दी हैं। '' व्रत/रोजा  करने वाले के लिए दो सुख होते हैं; एक अपने व्रत/रोजा  को खोलने के समय, और दूसरा उस समय जब वह अपने अल्लाह  से मिलेंगे। उपवास करने वाले व्यक्ति के मुंह से आने वाली गंध अल्लाह की कस्तूरी की सुगंध से बेहतर/पसंद  होती है। ” (अल-बुखारी और मुस्लिम)
हदीस के आदेश संस्करण में, अल्लाह के दूत ने कहा: "जो कोई भी रमजान में उपवास/रोजा  का पालन करता है, वह दृढ़ विश्वास और इनाम की आशा के साथ करता है, उसके पिछले पापों/गुनाह  को माफ कर दिया जाएगा।" (अल-बुखारी)
उन भरपूर पुरस्कारों और खूबियों को केवल खाने और पिने के एक नियमित  को छोड़कर प्राप्त नहीं किया जा सकता । बल्कि यह केवल उन लोगों द्वारा प्राप्त किया जाएगा जो वास्तव में उपवास/रोजा  का पालन उचित तरीके से करते हैं, फिर सभी बुरे कर्मों और दोषों को दूर करते हैं, जैसे कि झूठ बोलना, झूठ बोलना, गलत भाषण, अश्लील व्यवहार और बेतुका कार्य। अल्लाह के दूत ने कहा: "जो कोई भी गलत तरीके से बोलने से परहेज नहीं करता है, और झूठे भाषण पर काम करता है, अल्लाह को उसे खाने और पीने से परहेज नहीं चाहिए ।" (अल-बुखारी)
और उसने कहा: “उपवास/रोजा  ढाल है; इसलिए एक दिन जो उपवास/रोजा  कर रहा है, उसे आपत्तिजनक व्यवहार या बहस करने से बचना चाहिए; अगर कोई मौखिक रूप से उसे गाली देता है या उसे उकसाता है, तो उसे कहना चाहिए; 'मैं उपवास/रोजा  कर रहा हूँ'।" (अल-बुखारी और मुस्लिम)

2. तरावीह की नमाज़
रमजान का एक और अच्छा काम है रात की नमाज (तरावीह) अदा करना, अल्लाह के प्रति बेहद विनम्रता और स्पष्ट श्रद्धा के साथ। सबसे अनुग्रह के सेवकों के गुणों का वर्णन करते हुए, अल्लाह ने कहा:
"जो कोई रमजान में रात की प्रार्थना करता है, दृढ़ विश्वास के साथ और इसके लिए एक इनाम की उम्मीद करता है, उसके पिछले पापों को माफ कर दिया जाता है।" (अल-बुखारी और मुस्लिम)

3. ज़कात और सदक़ाह -
रमजान के इस मुबारक महीने का तीसरा शुभ काम दान और परोपकार है, जिसने इब्न अब्बास रजि अल्लाह ने फ़रमाया “अल्लाह का नबी सलल्लाहो अलैहि वस्सलाम  लोगों में सबसे अधिक उदार था, और वह रमजान के महीने  में और ज्यादा  सदक़ह , खैरात , तोहफे देते थे , जब जिबराइल अलैहि सलाम  (गेब्रियल) नबी से मिलने आते थे । जिबरेल अलैहि सलाम हर साल रमजान की रात में महीने के अंत तक उनसे मिलते थे। अल्लाह के रसूल सलल्लाहो अलैहि वस्सलाम जिबरेल को कुरआन मजीद, सुनाते थे , और जब जिबरेल उससे मिले, उस वक़्त अल्लाह के रसूल बहोत ज्यादा खैर करते थे , अल्लाह को ख़ुशी ख़ुशी (बारिश) के साथ भेजा गया, जो जो सदक़ाह करते है , अल्लाह उन्हें खुश खबरि देता है । ” (मुस्लिम)
इस हदीस से यह अच्छी तरह से समझा जाता है कि रमज़ान के मुबारक महीने के दौरान दान और दयालु कार्य करने में खर्च अन्य महीनों की तुलना में अधिक पुण्य/ सवाब  है।
ज़कात, सदक़ह और तोहफे  में देने का लक्ष्य अल्लाह का सुख प्राप्त करना है। यह उनकी सामाजिक जरूरतों का ख्याल रखते हुए, गरीबों, जरूरतमंदों, अशिक्षितों, अनाथों, विधवाओं, शोषितों और दलितों, आदिवासियों के धन पर खर्च करके, धन प्राप्त करने से प्राप्त किया जाएगा।
4. रोजदार का इफ्तार कराना
एक और अच्छा काम भोजन या पेय प्रदान करना है जिसके साथ कोई अपना उपवास/रोजा  खोलेंगे  देगा। अल्लाह के नबी सल्ललाहो अलैहि वस्सलाम ने कहा: "वह जो उपवास करने वाले को कुछ ऐसा प्रदान करता है जिसके साथ उसके रोजा  को खोलने  के लिए, वह उसी इनाम को अर्जित करेगा जो उपवास का पालन कर रहा था, बिना बाद के इनाम को कम किए हुए।" (तिर्मिज़ी)
हदीस के एक अन्य संस्करण में अल्लाह के संदेशवाहक ने कहा: "जो रोजा करने वाले को कुछ ऐसा प्रदान करता है जिसके साथ वह अपना उपवास खोल सकता है, या वह जो एक लड़ाकू (अल्लाह के रास्ते में युद्ध सामग्री के साथ) लड़ने का सामान  करता है, वह उतना ही इनाम अर्जित करेगा जितना कि एक जो कर रहा था। " (अल-तिर्मिदी, शेख अल-अलबानी द्वारा साहिह अल-तर्गीब, क्रमांक -10७२  में प्रमाणित)

5. कुरआन की ज्यादा से ज्यादा तिलावत करना
रमजान का धन्य महीना वह महीना है जिसमें कुरआन को नाजिल  किया। इस प्रकार, रमजान का यह धन्य महीना कुरान के संबंध में और भी खास है, क्योंकि अल्लाह ने इस दौरान कुरान को प्रकट करके इसे प्रतिष्ठित किया। एक और कारण यह है कि रमजान की हर रात में, एन्जिल जिबरेल (गेब्रियल)  अलैहि सलाम अल्लाह के नबी  सल्ललाहो अलैहि वस्सलाम से मिलते थे, जो जिबरेल अलैहि सलाम  को पूरा  कुरआन को सुनाते थे।
पैगंबर और उनके उत्तराधिकारियों (खलीफा ) के साथी इस धन्य महीने के दौरान कुरान को पढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करेंगे, इसे अपनी सर्वश्रेष्ठ क्षमता के अनुसार दस, सात, और तीन या उससे भी कम दिनों में पूरा करते । कुछ विद्वान अपने दृष्टिकोण में दृढ़ हैं कि एक प्रामाणिक हदीस के अनुसार तीन दिनों से कम समय में पूरे कुरान को पढ़ना निषिद्ध है। यह सामान्य दिनों और सामान्य परिस्थितियों से संबंधित है, जबकि, धन्य समय और पवित्र स्थानों को इस सामान्य नियम से छूट दी गई है।

6. अल्लाह का दर और खौफ के साथ क़ुरान की तिलावत की जाये
यह उन सभी के लिए आवश्यक है जो विनम्रता की भावना के साथ  कुरान करीम को सुनते या सुनाते  हैं। यह इसे सुनाने वाले दोनों को प्राप्त हो सकता है अगर श्रोता इसके अर्थों के अनुवाद से परिचित होते हैं, क्योंकि कुरआन को सुनियोजित ढंग से सुनाया जाता है और मधुर शैली प्रतिबंधित होती है। फिर भी, तथ्य यह है कि कुरआन एक ऐसी कहानी नहीं है जो कहानियों और कहानियों का प्रसार करती है; बल्कि यह पूरी मंशा के साथ सुनाया जाना चाहिए कि यह सभी मानवता के सच्चे मार्गदर्शन के लिए एक वसीयतनामा है। नोबल कुरआन का हर एक वचन, वादे और धमकियाँ जारी करना, अच्छी ख़बरें और नसीहतें देना, चिंतनपूर्वक पढ़े जाना है। जहां भी किसी भी आयात  में अल्लाह की दया का उल्लेख किया गया है, क्षमा मांगना, अच्छी खबर और वह विश्वास जो अल्लाह ईमानवालो को अनुदान देता है, और फिर यह अल्लाह से अनुरोध करने के लिए उसका अनुरोध करने के लिए एक की सिफारिश की जाती है। इसी तरह, जहां कहीं भी चेतावनी और चेतावनी, सजा और खतरे का उल्लेख है, तो उससे अल्लाह की सुरक्षा लेने की सिफारिश की जाती है। हमारे धर्म के पूर्ववर्ती लोग कुरान का पाठ कर रहे थे, इसके अर्थों पर बार-बार विचार कर रहे थे, मानो ऐसा करते समय वे सब से पहले अल्लाह के सामने खड़े थे। जो लोग कुरान को इस तरह से सुनते हैं, वे अपने अर्थ पर विचार करते समय समझ के साथ इस तरह के जबरदस्त तरीके से प्रभावित होते हैं।
        
7. इतिकाफ में बैठें
रमजान के विशेष कार्यों में से एक एतेकाफ़  है। पैगंबर अपने अच्छे काम के लिए विशेष ध्यान देते थे और विशेष महत्व देते थे। रमजान के आखिरी दस दिनों और रातों के दौरान, इस तरह के एक वक़्त  में खुद को मस्जिद में रखा जाता है, इबादत  पर ध्यान केंद्रित किया जाता है, सांसारिक गतिविधियों और मामलों को छोड़ दिया जाता है। पैगंबर इस प्रथा के लिए बहुत ही समय के पाबंद थे, हदीथ  में बताया गया है कि एक बार उन्होंने इत्तिफाक की प्रथा को याद किया था, इसलिए उन्होंने इसे शव्वाल के महीने किया , (अल-बुखारी) के आखिरी दस दिनों में से दस दिनों के लिए किया। पैगंबर हर साल रमजान के महीने में दस दिनों के लिए इतिकाफ में रहा  करते थे, और अपनी मृत्यु के वर्ष के दौरान, वे बीस दिनों तक इतिकाफ में रहे। (अल-बुखारी)।
इतिकाफ करने का अर्थ है कि अकेले अल्लाह की इबादत करने, हर सांसारिक और व्यक्तिगत संबंध को छोड़ने के उद्देश्य से किसी मस्जिद में एकांत में अपने आप को रोके  रखना। सभी का मन विशेष रूप से अल्लाह को प्रसन्न करने के लक्ष्य पर केंद्रित है। वह विभिन्न प्रकार की इबादत , जिक्र , तौबा , इस्तगफार  पश्चाताप, और अल्लाह की क्षमा को नष्ट करने में लगा हुआ है। वह स्वेच्छा से उतनी ही प्रार्थनाएं करता है जितनी वह कर सकता है। इस अर्थ में, अल्लाह को स्मरण और आह्वान आदि के कथन कहना, इतिकाफ का अभ्यास करना इबादत के कई कार्यों का एक संयोजन है।

8. लैलतुल क़द्र को पाना
क़द्र की रात: इसकी एक रात एक हजार महीनों की तुलना में अधिक पुण्यदायी और मेधावी होती है। यह रात रमजान के आखिरी दस दिनों की पांच विषम रातों में से एक में होगी। इसकी घटना का सही समय एक पूर्ण रहस्य है। इसकी गोपनीयता के पीछे संभावित कारणों में से एक यह है कि एक सच्चे ईमानवालो  को उन असमान रातों के दौरान इबादत करने का प्रयास करना चाहिए ताकि उस प्रचुर समय के सभी समृद्ध इनाम और पुण्य प्राप्त हो सकें।
अल्लाह के दूत ने इस रात के  श्रेष्ठता का वर्णन किया और कहा: "जो कोई भी क़द्र  की रात के दौरान प्रार्थना करता है, दृढ़ विश्वास के साथ और इसके लिए इनाम की उम्मीद करता है, उसके पिछले पापों को माफ कर दिया जाता है।" (अल-बुखारी और मुस्लिम)
दूसरे शब्दों में, जब भी आप पिछली दस रातों की विषम रातों में पूजा करने का प्रयास करते हैं, तो आप निश्चित रूप से क़द्र की रात के गुणों को प्राप्त करेंगे।
9. अल्लाह के रसूल के आखरी १० दिन रमदान के आमाल
यह स्पष्ट है कि इतिकाफ में बैठना रमजान के अंतिम दस दिनों तक ही सीमित है। रमजान की अंतिम दस रातों में से एक विषम रात के दौरान क़द्र की रात होने की संभावना है, और उस रात को खोजकर पूरी रात जागते रहना बेहतर है, रात की प्रार्थना (तरावीह)  सहित सभी प्रकार की इबादत ज्यादा से ज्यादा करना , और अल्लाह को याद कराना ( जिक्र वो तिलावत )।
इसके अलावा, अल्लाह का दूत खुद (पैगम्बर सल्ललाहो अलैहि वस्सलाम ) को इबादत  में अधिक परिश्रम करने के लिए तैयार करेगा, खासकर जब रमज़ान की आखिरी दस रातें शुरू हुईं। वह प्रार्थना और भक्ति के लिए रात में जागते रहते और अपने परिवार को जागृत करते। आइशा राजी अल्लाह अन्हा फरमाती है  "जब अंतिम दस रातें (रमज़ान की) शुरू हुईं, अल्लाह का दूत रात में (प्रार्थना और भक्ति के लिए) जागते  रहते , अपने परिवार को जगाते और खुद को इबादत  में और अधिक इजाफा करने के लिए तैयार करते ।" (मुस्लिम)
हदीस के एक अन्य संस्करण में, आयशा रजी अल्लाह ने कहा; "अल्लाह के संदेशवाहक ( नबी ) सल्ललाहो अलैहि वस्सलाम   रमजान की पिछली दस रातों के दौरान इबादत  अधिक प्रयास करते थे, जबकि उन्होंने अन्य समय के दौरान किया था।" (मुस्लिम)
इसलिए, हम इन आखिरी दस दिनों में भी प्रयास करते हैं कि अल्लाह की इबादत में खुद को समर्पित करें, और उसकी क्षमा मांगें।
10. क़द्र के रात के लिए खुसूसी दुआ
आइशा रजी अल्लाह फरमाती है "मैंने अल्लाह के दूत से पूछा: अल्लाह के रसूल सल्ललाही अलैहि वस्सलाम ,अगर मुझे क़द्र की रात का एहसास होता है, तो मुझे इसमें क्या दुआ  करना चाहिए? 'उन्होंने जवाब दिया,' आपको दुआ करनी चाहिए : अल्लाहुम्मा इनाका अफुवुन, तुहिबुल-अफवा फाफू  एनी '
ओ अल्लाह! आप सबसे क्षमाशील हैं और आपको क्षमा करना पसंद है; इसलिए मुझे माफ़ कर दो। '' (अल-तिर्मिधि, )
11. रमदान में उमराह करना
रमजान में उमराह करना विशेष रूप से पुण्यकारी है। उम्म सनन अल-अंसारियाह फरमाती है पैगंबर ने एक महिला से कहा: "जब रमजान आता है, तो उमराह   करें, क्योंकि रमजान में उमराह हज (इनाम में) के बराबर है।" (अल-बुखारी और मुस्लिम)
एक अन्य संस्करण में, अल-बुखारी के साथ; अल्लाह के दूत ने उससे कहा: "... क्योंकि यह मेरे साथ (इनाम में) हज के बराबर है।" (अल-बुखारी)

12.  दुआ और अज़कार
अल्लाह अज्ज व जल्ल ने  दुआ और अज़कार को  प्रोत्साहित किया है, जैसा कि हम  कुरान करीम  में पढ़ते हैं, जबकि वह रमजान के पवित्र महीने से संबंधित मुद्दों और नियमों का उल्लेख करते हैं। अल्लाह कहता है:
(ऐ रसूल) जब मेरे बन्दे मेरा हाल तुमसे पूछे तो (कह दो कि) मै उन के पास ही हूँ और जब मुझसे कोई दुआ माँगता है तो मै हर दुआ करने वालों की दुआ  क़ुबूल करता हूँ पस उन्हें चाहिए कि मेरा भी कहना माने) और मुझ पर ईमान लाएँ ” (२:  18६)
एक हदीस में, अल्लाह के रसूल सल्ललाहो अलैहि वस्सलाम ने कहा: " बन्दे की दुआ का जवाब अल्लाह देता है, जब तक वह किसी पापी चीज़ के लिए या किसी ऐसी चीज के लिए नहीं मांगता , जो किसी रिश्तेदारी के संबंधों को काट देती, और वह सब्र नहीं खोता है ।" यह कहा गया था, "हे अल्लाह के रसूल ये सब्र का खोना  का क्या मतलब है? " उन्होंने कहा, "यह एक कहावत है,, मैंने बार-बार प्रार्थना की, लेकिन मुझे नहीं लगता कि मेरे दुआ का जवाब दिया जाएगा। तब वह निराश (ऐसी परिस्थितियों में) हो जाता है और पूरी तरह से त्याग देता है।" (अल-बुखारी और मुस्लिम)
पैगंबर ने एक व्यक्ति का उल्लेख किया जो भटक ​​रहा है, खो गया है; उसके बाल अस्त-व्यस्त और धूल से ढंके हुए हैं। वह आकाश की ओर हाथ उठाता है और इस प्रकार प्रार्थना करता है:
  ये अल्लाह ,ये अल्लाह ,लेकिन उसका खाना हराम  है, उसका पीना  हराम  है, उसके कपड़े हराम  हैं। और उसका पोषण हराम है, वह कैसे कर सकता है, फिर उसके दुआ  को कैसे स्वीकार कर लिया जाये  ? " (मुस्लिम)
यह बहुत स्पष्ट है कि कुछ शर्तों और शिष्टाचारों को पूरा करना जरूरी है , दुआ के कुबूल होने के लिए, जैसी हदीस में बयां है। इसके अतिरिक्त, जो कोई भी इन नियमों का पालन करता है, तो वह अपने कार्यों के लिए अधिक इनाम पायंगे । अल्लाह के नबी सल्ललाहो अलैहि वस्सलाम ने कहा:
जब भी कोई मुस्लिम पाप करता है - न तो पाप के लिए और न ही रिश्तेदारी के बंधन को तोड़ने के लिए - अल्लाह तीन तरीकों में से एक में उसके दुआ  का जवाब देता है। या तो उसके आह्वान का शीघ्रता से जवाब दिया जाएगा, या उसके बाद उसे (उसके प्रतिफल) से वंचित किया जाएगा, या इसी तरह की परेशानी से उसे दूर किया जाएगा। " इस पर वे (साथी) ने कहा, "अगर हम बहुत मांगें तो क्या होगा?" अल्लाह के नबी  ने कहा, अल्लाह  को देने  के लिए कोई कमी नहीं है , अल्लाह के ख़ज़ाने भरे हुआ है।
13. गैरमौजूदगी में किसी के लिए दुआ करना
लोगों को न केवल अपने लिए दुआ करनी चाहिए , बल्कि उन्हें अपने दोस्तों, रिश्तेदारों और पड़ोसियों के लिए, उनकी अनुपस्थिति में, सच्चे दिल से प्रार्थना करनी चाहिए।
अल्लाह के नबी सल्ललाहो अलैहि वस्सलाम  ने कहा; “उनकी अनुपस्थिति में उनके (मुस्लिम) भाई के लिए एक मुस्लिम का दुआ का  निश्चित रूप से जवाब दिया जाएगा। हर बार जब वह अपने भाई के लिए भलाई के लिए दुआ करता है, तो इस विशेष कार्य के लिए नियुक्त फ़रिश्ते अमीन कहते और यह कहते की यह तुम्हारे लिए भी हो (यह आपके लिए भी हो सकता है)। ” (मुस्लिम)
14. किसी को बदुआ न दो/ इस से इन्हेराफ़ करो
इंसान स्वाभाविक रूप से कमजोर दिमाग और अधीर है। एक बार जब वह किसी से चेहरे की गड़बड़ी को असहज महसूस करता है, तो वह तुरंत दूसरों पर, कभी-कभी अपने बच्चों पर या खुद पर भी शाप देता है। अल्लाह के दूत ने कहा; "अपने आप पर या अपने बच्चों पर, या अपनी संपत्ति पर कोई शाप न दें, ऐसा न हो कि ऐसा वक़्त दुआ कुबूल होने का हो , और जो आपने कहा वह कुबूल हो जाये , ।" (मुस्लिम)
15. मजलूम की दुआ
यह याद रखना सबसे महत्वपूर्ण है कि किसी भी मुस्लिम को अन्यायपूर्ण तरीके से चोट नहीं पहुंचानी चाहिए और न ही किसी अन्य मुस्लिम पर अत्याचार करना चाहिए, न ही किसी इंसान पर, क्योंकि अत्याचारियों का दमन तुरंत अल्लाह से जवाबदेह है। अल्लाह के दूत ने कहा: "उत्पीड़ितों के दमन से सावधान रहें, क्योंकि उनके और अल्लाह के बीच कोई अवरोध नहीं है।" (अल-बुखारी)
16. अपने वदो को पूरा करो और बुराई को छोड़ दो
यह महीना अल्लाह से माफी, पश्चाताप और दया मांगने का एक विशेष महीना है। दूसरे शब्दों में, प्रत्येक मुसलमान को अल्लाह के प्रति पश्चाताप करने का प्रयास करना चाहिए, जिसके द्वारा अल्लाह अपने छोटे पापों को क्षमा करेगा। इस बीच, जहां तक ​​मानवाधिकारों का संबंध है, तब तक कोई क्षमा नहीं किया जाएगा, जब तक कि वे इस दुनिया में, मामले से पूरी नहीं हो जातीं। उदाहरण के लिए, यदि आपने किसी से चोरी की है, तो आपको उसके लिए उसकी प्रतिपूर्ति करनी होगी। यदि आप उसे गाली देते हैं या उसकी बदनामी करते हैं, तो आपको उसे क्षमा करने और माफी मांगने के लिए संपर्क करना चाहिए। यदि आपके पास कुछ ऐसी सामग्री है, जो वास्तव में आपकी नहीं है, तो आपके पास कुछ भूमि है, तो आपको उसके उचित मालिक को वापस करना होगा। उचित शिष्टाचार के बावजूद, यदि दूसरों के अधिकारों को पूरा नहीं किया जाता है, तो किसी के पश्चाताप और दलीलें स्वीकार्य नहीं हैं। इसी तरह, अगर उसने अल्लाह की आज्ञाओं की अवहेलना की, तो उसके साथ सभी व्यवहारों में अवज्ञाकारी होने के नाते, उदाहरण के लिए, वह रिश्वत लेता है, या सूदखोरी और ब्याज से पैसा कमाता है, नाजायज और निषिद्ध व्यवसाय में, झूठी गवाही के साथ शपथ लेकर सौदे करता है। झूठ और धमकी। ये सभी बुरे कार्य हैं जिन्हें छोड़ देना चाहिए। अन्यथा, अल्लाह आपको दुआ का जवाब नहीं देगा।
17. बुग्ज़ , किना और नफरत को छोड़ दे
अल्लाह की दया और क्षमा के पात्र होने के लिए यह बहुत आवश्यक है, कि हम आपसी दुश्मनी से दूर रहें, प्रत्येक ओ के साथ शिकायतें रखें